धुंद के बीच खड़े उस पेड़ ने मुझसे कुछ कहा था,
उसने मुझसे वक़्त रोक देने का वादा किया था'
लेकिन में लड़ रहा हूँ उस वादे से,
में लड़ रहा हूँ समय की चाल से,
में लड़ रहा हूँ हर उस ख्याल से,
जो पूछे थे उसने मुझसे, हर उस सवाल से !!!!
लेकिन वो सवाल रुक गए हैं,
और मुझे देख रहे हैं, खुद को दोहरा रहे हैं,
मेरे अन्दर समां रहे हैं
मुझ में रहने वाले "खुद" को दबा रहे हैं ....
इनका जवाब नहीं है मेरे पास
हाँ, लेकन वो पेड़ मेरा दोस्त है, दुश्मन नहीं ,
इसलिए वो मुझसे सवाल मांगता है , जवाब नहीं ..
कोई तर्क नहीं, वक़्त नहीं, रिश्ता नहीं, हिसाब नहीं ...!!!
न जाने उस धुंद के जादू ने क्या किया था,
और उस पेड़ ने मुझसे ये सब क्यों कहा था !!!!!!!!!!!!!!!
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